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Monday, 9 July 2018

July 09, 2018

Gupt Navaratri 2018: जानिए गुप्त नवरात्रि कब से शुरू, क्या है इसका खास महत्व

Gupt Navaratri 2018

गुप्त नवरात्रि 2018 आषाढ़ मास की नवरात्रि में पड़ती है और इसको अषाढ़ नवरात्रि 2018 भी कहा जाता है. 13 जुलाई 2018 से इस साल की गुप्त नवरात्रि प्रारम्भ हो रही है. बताया जाता है कि गुप्त नवरात्रि में भी अन्य नवरात्रि की तरह पूजा विधान है. मान्यता है कि तांत्रिक सिद्धियां गुप्त नवरात्रि में प्राप्त होती हैं. गुप्त नवरात्रि में 9 दिनों तक उपवास करने का विधान बताया गया है.
बताया जाता है कि गुप्त नवरात्रि के प्रांरभ होने के पहले दिन घटस्थापना की जाता है. घटस्थापना के बाद हर रोज सुबह और शाम के समय दुर्गा माता की पूजा अराधना करनी बताई गई है. इस साल जुलाई में गुप्त नवरात्रि पड़ रही है.

गुप्त नवरात्र पौराणिक कथा (Gupt Navratri 2018 Vrat Katha)

गुप्त नवरात्र के महत्व को बताने वाली एक कथा भी पौराणिक ग्रंथों में मिलती है कथा के अनुसार एक समय की बात है कि ऋषि श्रंगी एक बार अपने भक्तों को प्रवचन दे रहे थे कि भीड़ में से एक स्त्री हाथ जोड़कर ऋषि से बोली कि गुरुवर मेरे पति दुर्व्यसनों से घिरे हैं जिसके कारण मैं किसी भी प्रकार के धार्मिक कार्य व्रत उपवास अनुष्ठान आदि नहीं कर पाती। मैं मां दुर्गा की शरण लेना चाहती हूं लेकिन मेरे पति के पापाचारों से मां की कृपा नहीं हो पा रही मेरा मार्गदर्शन करें। तब ऋषि बोले वासंतिक और शारदीय नवरात्र में तो हर कोई पूजा करता है सभी इससे परिचित हैं।
लेकिन इनके अलावा वर्ष में दो बार गुप्त नवरात्र भी आते हैं इनमें 9 देवियों की बजाय 10 महाविद्याओं की उपासना की जाती है। यदि तुम विधिवत ऐसा कर सको तो मां दुर्गा की कृपा से तुम्हारा जीवन खुशियों से परिपूर्ण होगा। ऋषि के प्रवचनों को सुनकर स्त्री ने गुप्त नवरात्र में ऋषि के बताये अनुसार मां दुर्गा की कठोर साधना की स्त्री की श्रद्धा व भक्ति से मां प्रसन्न हुई और कुमार्ग पर चलने वाला उसका पति सुमार्ग की ओर अग्रसर हुआ उसका घर खुशियों से संपन्न हुआ। कुल मिलाकर गुप्त नवरात्र में भी माता की आराधना करनी चाहिये।

क्या है गुप्त नवरात्र की पूजा विधि (Gupt Navratri 2018 Puja Vidhi)

जहां तक पूजा की विधि का सवाल है मान्यतानुसार गुप्त नवरात्र के दौरान भी पूजा अन्य नवरात्र की तरह ही करनी चाहिये। नौ दिनों तक व्रत का संकल्प लेते हुए प्रतिपदा को घटस्थापना कर प्रतिदिन सुबह शाम मां दुर्गा की पूजा की जाती है। अष्टमी या नवमी के दिन कन्याओं के पूजन के साथ व्रत का उद्यापन किया जाता है। वहीं तंत्र साधना वाले साधक इन दिनों में माता के नवरूपों की बजाय दस महाविद्याओं की साधना करते हैं। ये दस महाविद्याएं मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां ध्रूमावती, माता बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी हैं। लेकिन एस्ट्रोयोगी की सभी साधकों से अपील है कि तंत्र साधना किसी प्रशिक्षित व सधे हुए साधक के मार्गदर्शन अथवा अपने गुरु के निर्देशन में ही करें। यदि साधना सही विधि से न की जाये तो इसके प्रतिकूल प्रभाव भी साधक पर पड़ सकते हैं।

गुप्त नवरात्रि 2018 शुभ मुहूर्त (Gupt Navratri Puja Shubh Muhurat)

  • 13 जुलाई (शुक्रवार) 2018: घट स्थापना और मां शैलपुत्री पूजा
  • 14 जुलाई (शनिवार) 2018: माँ ब्रह्मचारिणी पूजा
  • 15 जुलाई (रविवार) 2018 : माँ चंद्रघंटा पूजा
  • 16 जुलाई (सोमवार) 2018: माँ कुष्मांडा पूजा
  • 17 जुलाई (मंगलवार) 2018 : माँ स्कंदमाता पूजा
  • 18 जुलाई (बुधवार) 2018 : माँ कात्यायनी पूजा
  • 19 जुलाई (बृहस्पतिवार) 2018: माँ कालरात्रि पूजा
  • 20 जुलाई (शुक्रवार) 2018 : माँ महागौरी पूजा, दुर्गा अष्टमी
  • 21 जुलाई (शनिवार ) 2018: माँ सिद्धिदात्री, नवरात्रि पारण

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Wednesday, 16 May 2018

May 16, 2018

Astrology News: यमराज पर भारी पड़ गई एक नारी, बनीं सौ पुत्रों की माता

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वट सावित्री व्रत ज्‍येष्‍ठ मास के कृष्‍ण पक्ष की अमावस्‍या को मनाया जाता है। यह व्रत पति की दीर्घायु और संतान प्राप्ति की कामना के लिए महत्‍वपूर्ण है। व्रत से जुड़ी सावित्री की कथा में बताया गया है कि यदि एक स्‍त्री धैर्य और बुद्धिमानी के साथ कठिन परिस्थिति का सामना करे तो यमराज को भी उसके आगे हार माननी पड़ जाती है। देखिए सावित्री की चतुरता ने न केवल उसके पति के प्राण वापस लौटाए बल्कि उन्‍हें 100 पुत्रों की मां भी बनाया…

पिता ने कहा पुत्री से ‘अपने अनुसार चुन लें वर’

यौवनावस्‍था को प्राप्‍त कर लेने के पश्‍चात सावित्री के पिता मद्र देश के राजा अश्‍वपति अपनी पुत्री से कहा कि तुम अत्‍यंत विदुषी हो और अपने पति की खोज तुम अपने अनुसार स्‍वयं ही कर लो

सावित्री ने चुना सत्‍यवान को

पिता की आज्ञा के साथ ही सावित्री एक बुद्धिमान मंत्री को साथ लेकर पति की खोज पर निकल पड़ीं। काफी खोजबीन के बाद उन्‍हें सत्‍यवान के रूप में एक योग्‍य वर मिला। सावित्री ने लौटकर अपने पिता को सत्‍यवान के बारे में बताया तो वहां मौजूद देवर्षि नारद कहने लगे कि सावित्री ने अपने पति का सही चुनाव नहीं किया। उन्‍होंने जिस सत्‍यवान को पति के रूप में चुना है, उसकी आयु अब मात्र एक वर्ष ही शेष है। 

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नारद जी के वचन सावित्री को न डिगा सके

नारद जी के वचन सुनकर भी सावित्री बोलीं- ‘भारतीय नारी जीवन में केवल एक बार ही अपना पति चुनती है। इसलिए मैं सत्‍यवान से ही विवाह करूंगी।’ विवाह के पश्‍चात सावित्री अपने राजसी ठाठ-बाठ छोड़कर अपने पति और सास-ससुर के साथ वन में जीवन व्‍यतीत करने लगीं। सत्‍यवान के पिता शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन का राजपाट उनके पड़ोसी राजा ने छीन लिया था। तब से वह अपने पुत्र के साथ वन में रह रहे थे।

सावित्री के मन में बढ़ता जा रहा था भय

सावित्री जैसे-जैसे अपने वैवाहिक जीवन में रम रही थीं, वैसे-वैसे उनका भय भी बढ़ता जा रहा था कि वह दिन करीब आने वाला है जब सत्‍यवान की मृत्‍यु हो जाएगी। उस दिन के आते ही सावित्री साया बनकर अपने पति के साथ रहने लगी। वन में लकड़ी काटने के लिए सत्‍यवान जैसे ही पेड़ पर चढ़े वह अस्‍वथ होकर जमीन पर गिर पड़े। सावित्री ने उन्‍हें संभाला और उनका सिर अपनी गोद में रखकर लिटा लिया। कुछ समय बाद सत्‍यवान अचेत हो गए। सावित्री सब कुछ समझ चुकी थीं। 

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यमराज और सावित्री का वार्तालाप

सावित्री अपने पति की मृत्‍यु का विलाप कर ही रही थीं कि थोड़ी देर में यमराज प्रकट हो गए। यमराज सत्‍यवान को अपने साथ लेकर दक्षिण दिशा की ओर जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल दीं। सावित्री को अपने पीछे आते देख यमराज ने उनसे कहा, ‘तू मेरे पीछे मत आ क्योंकि तेरे पति की आयु पूर्ण हो चुकी है और वह अब तुझे वापस नहीं मिल सकता। अब तू लौट कर अपने पति के मृत शरीर की अन्त्येष्टि कर।’ सावित्री ने उत्‍तर दिया, ‘मैं आपके तो क्‍या अपने पतिव्रता धर्म को निभाने के लिए किसी भी लोक तक जा सकती हूं।’

सावित्री से प्रसन्‍न होकर यमराज ने दिया यह वर

सावित्री के पतिव्रता धर्म से प्रसन्‍न होकर यमराज ने उनसे एक वर मांगने को कहा। सावित्री ने वर में अपने नेत्रविहीन ससुर के लिए नेत्र ज्‍योति मांगी। यमराज ने कहा, तथास्‍तु। फिर से सावित्री ने कहा, ‘मुझे आप जैसे महान देवता के दर्शन हुए, मैं धन्‍य हो गई।’ सावित्री की इन बातों से यमराज ने फिर से प्रसन्‍न होकर एक वर मांगने को कहा। इस बार सावित्री ने अपने ससुर को उनका राज्‍य वापस मिलने का वर मांग लिया। यह सिलसिला चलता रहा और सावित्री की बातों से यमराज प्रसन्‍न होते रहे और सावित्री एक के बाद एक वर मांगती गईं।

जब सावित्री ने मांगा संतान प्राप्ति का वर

जब यमराज ने सावित्री से अंतिम वर मांगने को कहा तो सावित्री बोलीं, मुझे अपने ससुर द्युमत्सेन के कुल की वृद्धि के लिए 100 पुत्र प्राप्‍त करने का वरदान दें। यमराज फिर से तथास्‍तु बोलकर चल दिए। सावित्री भी पीछे-पीछे चल दी। सावित्री को फिर से पीछे आता देख यमराज ने कहा, मेरा कहना मान और अब तू वापस चली जा। इस पर सावित्री बोलीं, आपने जो मुझे 100 पुत्र प्राप्‍त करने का वरदान दिया है। यदि मेरे पति का अंतिम संस्‍कार हो गया तो मैं 100 पुत्रों को कैसे जन्‍म दूंगी। सावित्री की इस चतुरता के आगे यमराज को हार माननी पड़ी। यमराज ने सत्‍यवान को जीवनदान दिया और इस प्रकार सावित्री ने आगे चलकर 100 पुत्रों को जन्‍म दिया।

स्रोत : navbharattimes

Monday, 5 February 2018

February 05, 2018

Khatu Shyam Baba Temple History in Hindi खाटूश्यामजी की कहानी और खाटूश्याम बाबा मन्दिर का इतिहास [VIDEO]

Khatu Shyam Baba Temple History in Hindi

Khatu Shyam Baba Temple खाटूश्यामजी राजस्थान के सीकर जिले में स्तिथ एक पवित्र मन्दिर है जो महाभारत काल में बना मन्दिर माना जाता है | Khatu Shyam Baba खाटूश्यामजी को भगवान श्री कृष्ण का अवतार माना जाता है जिसकी देश के करोड़ो लोग पूजा करते है | खाटूश्यामजी मन्दिर में हर वक़्त भक्तो का ताँता लगा रहता है और विशेष रूप से होली से कुछ दिन पहले सीकर जिले में खाटूश्यामजी का विशाल मेला आयोजित होता है जिसमे राजस्थान सहित अन्य प्रदेशो के श्रुधालू भी बाबा के दर्शन करने आते है | Khatu Shyam Baba Temple खाटूश्यामजी मन्दिर के इतिहास को जानने से पहले आइये आपको Khatu Shyam Baba खाटूश्यामजी की कहानी के बारे में बताते है |

Khatu Shyam Baba Story in Hindi 

खाटूश्यामजी की कहानी महाभारत काल से शुरू होती है जिस वक़्त उनका नाम बर्बरीक था | बर्बरीक , भीम का पौत्र और घटोत्कच का पुत्र था | बर्बरीक बचपन से ही बहुत वीर योद्धा था जिसमे अपनी माँ से युद्ध कला सीखी थी | भगवान शिव ने बर्बरीक से प्रस्सन होकर उसे तीन अचूक बाण दिए जिसकी वजह से बर्बरीक को “तीन बाण धारी ” कहा जाने लगा | उसके बाद अग्नि देव ने उन्हें एक तीर दिया जिससे वो तीनो लोको पर विजय प्राप्त कर सकता था | जब बर्बरीक को पता चला कि पांड्वो और कौरवो के बीच युद्ध अटल है तो वो महाभारत युद्ध का साक्षी बनना चाहता था |उसने अपनी माँ को वचन दिया कि वो युद्ध में भाग लेने की इच्छा रखता है और वो हारने वाली सेना की तरफ से लड़ना चाहटा है | इसके बाद बर्बरीक वो नील घोड़े पर सवार होकर तीन बाण लेकर रवाना हो गया |

रास्ते में श्री कृष्ण ने ब्राह्मण का वेश धारण कर बर्बरीक को रोका ताकि वो उसकी शक्ति की परीक्षा ले सके |  उन्होंने बर्बरीक को उकसाया कि वो वो केवल तीन तीरों से युद्ध कैसे लड़ेगा | इस बात का जवाब देते हुए बर्बरीक ने कहा कि उसका एक बाण ही दुश्मन की सेना के लिए काफी है और वो वापस अपने तरकश में लौट आएगा | बर्बरीक ने तब श्रीकृष्ण को बताया कि उसके पहले तीर से वो निशान बनाएगा जिसको उसे समाप्त करना है और उसके बाद तीसरा तीर छोड़ने पर उसके निशान वाली सभी चीजे तबाह हो जायेगी | उसके बाद वो तीर वापस तरकश में लौट आएगा | अगर वो दुसरे तीर का प्रयोग करेगा तो पहले तीर से जो भी निशान लगाये थे वो सभी चीजे सुरक्षित हो जायेगी | कुल मिलाकर वो एक तीर से तबाही और एक तीर से रक्षा कर सकता था |
जब श्री कृष्ण को बर्बरीक की शक्ति का पता चला तो उन्होंने बर्बरीक को चुनौती दी कि अगर वो जिस पीपल के पेड़ के नीचे खड़ा है उसके सभी पत्तो को आपस में बाँध देगा तो उनको  बर्बरीक की शक्ति पर विश्वास हो जाएगा | बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार कर ली उअर तीर छोड़ने से पहले ध्यान लगाने के लिए आँखे बंद कर दी | तब श्री कृष्ण से बर्बरीक को पता लगे बिना , पीपल की एक पपत्ती को तोडकर अपने पैरो के नीचे छुपा लिया | जब बर्बरीक ने पहला तीर छोड़ा तो सभी पत्तियों और निशान हो गये और अंत में सभी पत्ते श्री कृष्ण के पैरो के आस पास घुमने लगे |

अब श्री कृष्ण ने बर्बरीक से पूछा कि “तीर भी मेरे पैरो के चारो ओर क्यों घूम रहा है ? ” इस पर बर्बरीक ने जवाब दिया कि “शायद आपके पैरो के नीचे एक पत्ती रह गयी है और ये तीर उस छुपी हुयी पत्ती को निशाना बनाने के लिए पैरो के चारो ओर घूम रहा है ” | बर्बरीक ने श्री कृष्ण से कहा “ब्राह्मण राज आप अपना पैर यहा से हटा लीजिये वरना ये तीर आपके पैर को भेद देगा “| श्री कुष्ण के पैर हटते ही उस छुपी हुयी पत्ती ;पर भी निशान हो गया | उसके बाद बर्बरीक के तीसरे तीर से सारी पत्तिय इकठी हो गयी और आपस में बंध गयी | तब श्री कृष्ण ने समझ लिया कि बर्बरीक के तीर अचूक है लेकिन अपने निशाने के बारे में खुद बर्बरीक को भी पता नही रहता है |
इस घटना से श्री कृष्ण ने ये निष्कर्ष निकाला कि असली रण भूमि में अगर श्रीकृष्ण अगर पांडव भाइयो को अलग अलग कर देंगे और उन्हें कही छिपा देंगे ताकि वो बर्बरीक का शिकार होने से बच जाए तब भी बर्बरीक के तीरों से कोई नही बच पायेगा | इस प्रकार श्री कुष्ण को बर्बरीक की शक्ति का पता चल गया कि उनके अचूक तीरों से कोई नही बच सकता है | तब श्री कृष्ण ने युद्ध में उनकी तरफ से लड़ने का प्रस्ताव दिया | बर्बरीक ने अपनी गुप्त बात उनको बताई कि उसने अपनी माता को वचन दिया है कि वो केवल हार रही सेना की तरफ से लड़ेंगे |

कौरवो को भी बर्बरीक के इस वचन के बारे में पता था इसलिए उन्होंने युद्ध के पहले दिन अपनी ग्यारह अक्षौनी सेना को नही उतारा था ताकि जब कौरवो की सेना पहले दिन पांड्वो से हार जाए तो बर्बरीक कौरवो का सहयोग कर पांड्वो का विनाश कर देगा | इस प्रकार जब वो कौरवो की तरफ से लड़ेगा तो पांड्वो की लड़ रही सेना कमजोर हो जायेगी उसके बाद वो पांड्वो की सेना में चला जाएगा | इस तरह वो दोनों सेनाओ में घूमता रहेगा | श्री कृष्ण को अब लगने लगा था कि अगर बर्बरीक इस युद्ध में शामिल हुआ तो कोई भी सेना नही जीत पायेगी और अंत में कौरव-पांडव दोनों का विनाश हो जायेगा और केवल बर्बरीक शेष रह जाएगा | तब श्री कृष्ण ने विचार किया कि बर्बरीक को रोकने के लिए उनको बर्बरीक से उसकी जान मांगनी होगी |

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तब श्री कृष्ण ने बर्बरीक से दान की मांग की तब बर्बरीक ने कहा “प्रभु आपकी जो इच्छा हो मै आपको देने को तैयार हु ” | श्री कृष्ण ने दान में बर्बरीक का सिर माँगा | बर्बरीक भगवान श्री कृष्ण की अनोखी मांग को सुनकर चकित रहा गया और इस अनोखी मांग पर उस ब्राह्मण को अपनी असली पहचान बताने को कहा | श्री कृष्ण ने बर्बरीक को अपना विराट रूप दिखाया और बर्बरीक उसे देखकर धन्य हो गया | श्री कृष्ण ने तब बर्बरीक को समझाया कि “रण भूमि में युद्ध से पहले सबसे वीर क्षत्रिय की बलि देनी पडती है इसलिए मै तुमसे तुम्हारा सिर दान में मांग रहा हु और मै तुमको इस धरती का सबसे वीर क्षत्रिय होने का गौरव देता हु ” |

अपने वादे को निभाते हुए श्रीकृष्ण के आदेश पर बर्बरीक ने अपना सिर दान में दे दिया | ये घटना फागुन महीने के शुक्ल पक्ष के 12 वे दिन हुयी थी | अपनी जान देने से पहले बर्बरीक ने श्री कृष्ण ने अपनी एक इच्छा जाहिर की वो महाभारत युद्ध को अपनी आँखों से देखना चाहता है | श्री कृष्ण ने उसकी ये इच्छा पुरी की और सिर अलग करने के बाद उनके सिर को एक उची पहाडी पर रख दिया जहा से रण भूमि साफ नजर आती थी | वही से बर्बरीक के सिर ने पूरा महाभारत युद्ध देखा था |

 
युद्ध खत्म होने पर जब जीते हुए पांडव भाइयो ने एक दुसरे से बहस करना शूर कर दिया कि युद्ध की जीत का जिम्मेदार कौन है तो श्री कृष्ण ने बर्बरीक के सिर को इस निर्णय लेने को कहा कि किसकी वजह से पांडव युद्ध जीते | तब बर्बरीक के सिर ने सुझाव दिया कि श्री कृष्ण अकेल ऐसे है जिनकी वजह से महाभारत युद्ध में पांड्वो की जीत हुयी क्योंकि उनकी रणनीति की इस युद्ध में अहम भूमिका थी और इस धर्मं युद्ध में धर्म की जीत हुयी |

ये Khatu Shyam Baba मन्दिर रूप सिंह चौहान ने 1027 ईस्वी में बनवाया था जब उनकी पत्नी को भी जमीन में दफन उस सिर का सपना आया था | वो जगह जहा से उस प्रतिमा को निकाला गया उसे श्याम कुंड कहते है | 1720 ईस्वी में दीवान आभासिंह ने इस मन्दिर का पुर्ननिर्माण करवाया तब से ये Khatu Shyam Baba मन्दिर उसी स्थिथि में है और अज भी उस प्रतिमा की चमक बरकरार है | खाटूश्यामजी आज कई घरो के पारिवारिक देवता है | उनका एक नया मन्दिर अहमदाबाद में भी बनवया गया है जिसे बलिया देव कहा जाता है जहा पर पर नवजात शिशुओ को आशीर्वाद दिलाने के लिए माता पिता लेकर आते है |

Source: gajabkhabar
February 05, 2018

Mahashivratri 2018: क्या है महाशिवरात्रि का महत्व, किस तरह करें भगवान शिव को प्रसन्न

Mahashivratri 2018
 
13 फरवरी, मंगलवार को महाशिवरात्रि का त्योहार मनाया जाएगा। महाशिवरात्रि का त्योहार शिवभक्तों के लिए  बहुत महत्व रखता है। शिवरात्रि पर शिव भक्त भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए इस दिन व्रत रखते है और पूरी भक्तिभाव से शिवजी की पूजा और आराधना करते हैं। लेकिन भूलवश शिव जी को प्रसन्न के लिए ऐसी कुछ गलतियां कर देते हैं जिससे उनकी पूजा पूरी नहीं हो पाती है। शास्त्रों में कुछ ऐसी चीजों के बारे में बताया गया है जिससे भगवान शिव की पूजा में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।  

भगवान श‌िव को सफेद फूल बहुत पसंद होता है लेक‌िन केतकी का फूल सफेद होने के बावजूद भोलेनाथ की पूजा में नहीं चढ़ाना चाहिए। शिव पुराण के अनुसार केतकी के फूल ने झूठ बोला था ज‌िससे श‌िव जी ने इन्हें पूजा से वर्ज‌ित कर द‌िया।
 
वैसे तो हिन्दू धर्म में शंख से देवी-देवताओं को जल देने की परंपरा है लेकिन भगवान श‌िव की पूजा करते समय शंख से जल अर्प‌ित नहीं करना चाहिए। श‌िव पुराण के अनुसार भगवान श‌िव ने शंखचूर नाम के असुर का वध क‌िया था इसल‌िए शंख श‌िवजी की पूजा में वर्ज‌ित माना जाता है ।
 
 
भगवान श‌िव की पूजा में तुलसी का प्रयोग वर्ज‌ित माना गया है। भगवान श‌िव ने देवी वृंदा के पत‌ि जलंधर का वध क‌िया था। देवी वृंदा ही तुलसी के रूप में अवतर‌ित हुई थी ज‌िसे भगवान व‌िष्‍णु ने देवी लक्ष्मी के समान स्‍थान द‌िया है इसल‌िए श‌िवजी की पूजा में तुलसी को वर्ज‌ित माना जाता है।
 
शिव की पूजा में तिल नहीं चढ़ाया जाता है। तिल भगवान व‌िष्‍णु के मैल से उत्पन्न हुआ माना जाता है इसल‌िए भगवान व‌िष्‍णु को त‌िल अर्प‌ित क‌िया जाता है लेक‌िन श‌िव जी को नहीं चढ़ता है।
 
भगवान शिव की पूजा में भूलकर भी टूटे हुए चावल नहीं चढ़ाया जाना चाहिए।अक्षत का मतलब होता है अटूट चावल, यह पूर्णता का प्रतीक है। इसल‌िए श‌िव जी को अक्षत चढ़ाते समय यह देख लें क‌ि चावल टूटे हुए तो नहीं है।

Mahashivratri 2018: महाशिवरात्रि का महत्व  
 
महाशिवरात्रि के पर्व का उत्सव एक दिन पहले ही शुरू हो जाता है. महाशिवरात्रि की पूरी रात पूजा और कीर्तन किया जाता है. इतना ही नहीं कई पुराण के अंदर शिवरात्रि का उल्लेख मिलेगा, विशेषकर स्कंद पुराण, लिंग पुराण और पद्म पुराणों में महाशिवरात्रि का उल्लेख किया गया है. शैव धर्म परंपरा की एक पौराणिक कथा अनुसार, यह वह रात है जब भगवान शिव ने संरक्षण और विनाश के स्वर्गीय नृत्य का सृजन किया था. हालांकि कुछ ग्रंथों में यह दावा किया गया है कि इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था.
 
 
 
 

Monday, 29 January 2018

January 29, 2018

चन्द्रग्रहण 2018: जानिए आपके शहर में किस समय दिखेगा ग्रहण और क्या होगा आपकी राशि पर असर

Lunar eclipse, eclipse in 2018
ग्रहण शाम 5.58 मिनट पर शुरू होगा और यह रात 8.41 तक रहेगा। यह भारत के ज्यादातर हिस्सों में दिखाई पड़ेगा।  यह ग्रहण उत्तर पूर्वी रूस, एशिया, अमेरिका, अफ्रीका व ऑस्ट्रेलिया में भी दिखाई देगा। सूतक का काल सुबह 10 बजकर 18 मिनट से शुरु हो जाएगा। सूतक के दौरान किसी प्रकार के शुभ कार्य की मनाही होती है। ग्रहण के समय भगवान की पूजा और भोजन करना वर्जित माना जाता है । सूतक के दौरान गर्भवती स्त्री का घर से बाहर निकलना और ग्रहण देखना वर्जित माना जाता है। 

ज्योतिषाचार्यो के अनुसार अलग-अलग शहरों में ग्रहण का समय अलग होगा।  इस दिन देहरादून (शाम 5.47), हरिद्वार (शाम 5.48),  दिल्ली (शाम 5.54), इलाहाबाद (शाम 5.40), अमृतसर (शाम 5.58), बैंगलुरू (शाम 6.16), भोपाल (शाम 6.02) बजे होगा।

चंडीगढ़ (शाम 5.52), चेन्नई (शाम 6.04), कटक (शाम 5.32),  गया (शाम 5.27), जालंधर (शाम 5.56), कोलकत्ता (शाम 5.17), लखनऊ (शाम 5.41), मुजफ्फरपुर (शाम 5.23), नागपुर (शाम 5.58), नासिक (शाम 6.22), पटना (शाम 5.26), पुणे (शाम 6.23), राँची (शाम 5.28) उदयपुर (शाम 6.15), उज्जैन (शाम 6.09), वड़ोदरा (शाम 6.21), कानपुर (शाम 5.44) बजे होगा।
चन्द्र ग्रहण का इन राशियों पर पड़ेगा प्रभाव 

मेष राशि- मेष राशि वाले व्यक्तियों के लिए यह ग्रहण अशुभफलदायक रहेगा। इस राशि के जातको को मानसिक अशान्ति और कष्ट का अनुभव होगा।

वृष राशि- वृष राशि वालों के लिए यह ग्रहण अनुकूल फल देने वाला साबित होगा। इस राशि वालों के लिए धन लाभ का योग बन रहा है।

मिथुन राशि- मिथुन राशि वालों के लिए यह चन्द्रग्रहण अशुभफलदायक है। आर्थिक नुकसान की संभावना हो सकती हैं। परिवार में तनाव पैदा हो सकता है।

कर्क राशि- कर्क राशि वालों के लिए यह ग्रहण शारीरिक परेशानी या फिर किसी हादसे का शिकार बन सकते है। सावधानी बरतें।

सिंह राशि- इस राशि के जातको के लिए यह ग्रहण व्यय में बढ़ोत्तरी लाएगा। आर्थिक हानि की आशंका है। किसी वाद-विवाद के चक्कर में फंस सकते हैं।

कन्या राशि- कन्या राशि वालों के लिए यह ग्रहण शुभ फल की प्राप्ति की संभावना बन सकती है। धनलाभ और उन्नति के योग बनेंगे।
तुला राशि- तुला राशि वालों के लिए यह ग्रहण शुभ रहेगा। सुख और समृद्धि में वृद्धि की संभावना है। किसी ऐसे व्यक्ति से मुलाकात संभव है जो भविष्य में आपके लिए फायदे दिलाने वाला साबित होगा।

वृश्चिक राशि- वृश्चिक राशि वालों के लिए यह ग्रहण अपमान, धनहानि और अपयश आदि का भय रहेगा। दम्पत्ति जीवन में परेशानियां आ सकती है।

धनु राशि- इस राशि वालों के लिए सावधानी रखने की आवश्यकता है। रोग, दुर्घटना का शिकार बन सकते है। मान सम्मान में गिरावट की आशंका हैं।

मकर राशि- ग्रहण का शादी शुदा जीवन में सुख के कमी का संकेत दे रहा है। जीवनसाथी के साथ विवाद हो सकता है। कानूनी मामलों में फसने का अंदेशा है।

कुंभ राशि- कुंभ राशि वालों के लिए यह ग्रहण अच्छा रहेगा। हर काम में सफलता मिलेगी। सुख की प्राप्ति संभव होगी और शत्रु परास्त होंगे।

मीन राशि- मीन राशि वालों के लिए यह ग्रहण अशुभ फल देने वाला साबित होगा। शारीरिक, मानसिक पीड़ा और चिन्ताएं सताएंगी।
January 29, 2018

चंद्रग्रहण में करें ये उपाय, दूर हो जाएंगे सारे दोष


Lunar Eclipse
31 जनवरी माघ माह पूर्णिमा को पूर्ण चंद्रग्रहण का भारत मे स्पर्श (पुष्य नक्षत्र) सायंकाल 05:18 बजे, मध्यम शाम 7:00 बजे और मोक्ष काल (श्लेषा नक्षत्र) रात्रि 08:42 मिनट पर होगा। यह चंद्र ग्रहण भारत वर्ष के साथ अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, कोरिया, रूस आदि जगहों पर भी दिखाई देगा।
जन्मपत्री मे चंद्रमा चौथे घर का कारक व कर्क राशी का स्वामी है।

चन्द्रग्रहण व चौथे घर से वाहन, अपना घर, मां से सम्बन्ध, मानसिक स्थति, धन आदि सुख की गणना की जाती है। जन्म कुंडली में चन्द्रगृह के साथ राहू या केतु होने पर ग्रहण दोष बनता है। जिन व्यक्तिओं की जन्मपत्री मे ग्रहण दोष होता है। ऐसे व्यक्तिओं के जीवन मे काफी उतार-चढाव, संघर्ष, धन सम्पत्ति वाहन विवाद व मानसिक अशांति, निराशा व परिवारिक विवाद रहता है।

ज्योर्तिवद् केदार मुरारी के अनुसार जन्मपत्री मे ग्रहण दोष निवारण के लिए चंद्र ग्रहण के समय एक किलो जौ दूध मे धोकर व एक सूखा नारियल बालो वाला जल प्रवाहित कर दे। इससे जन्मपत्री के दोषों का निवारण हो जाएगा।

Friday, 18 August 2017

August 18, 2017

बाबा बैद्यनाथ धाम, यहां ‘पंचशूल’ के दर्शन मात्र से ही पूरी होती है हर मनोकामना

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भारत के प्रसिद्ध शैव तीर्थस्थलों में झारखंड के देवघर का बैद्यनाथ धाम (बाबाधाम) अत्यंत महत्वपूर्ण है। बैद्यनाथ धाम को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वाधिक महिमामंडित कहा जाता है। यही कारण है कि यहां के ज्योतिर्लिंग पर जलाभिषेक करने वालों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके शीर्ष पर त्रिशूल नहीं, ‘पंचशूल’ है, जिसे सुरक्षा कवच माना गया है।

धर्माचार्यों का इस पंचशूल को लेकर अलग-अलग मत है। मान्यता है कि पंचशूल के दर्शन मात्र से ही भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं। मंदिर के तीर्थ पुरोहित दुर्लभ मिश्रा बताते हैं, ‘‘धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि भगवान शंकर ने अपने प्रिय शिष्य शुक्राचार्य को पंचवक्त्रम निर्माण की विधि बताई थी, जिनसे फिर लंकापति रावण ने इस विद्या को सिखा था। पंचशूल की अजेय शक्ति प्रदान करता है।’’

कहा जाता है कि रावण ने लंका के चारों कोनों पर पंचशूल का निर्माण करवाया था, जिसे राम को तोडऩा आसान नहीं हो रहा था। बाद में विभिषण द्वारा इस रहस्य की जानकारी भगवान राम को दी गई और तब जाकर अगस्त मुनि ने पंचशूल ध्वस्त करने का विधान बताया था। रावण ने उसी पंचशूल को इस मंदिर पर लगाया था, जिससे इस मंदिर को कोई क्षति नही पहुंचा सके।

मिश्र कहते हैं, ‘‘त्रिशूल’ को भगवान का हथियार कहा जाता है, परंतु यहां पंचशूल है, जिसे सुरक्षा कवच के रूप में मान्यता है। भगवान भोलेनाथ को प्रिय मंत्र ‘ओम नम: शिवाय’ पंचाक्षर होता है। भगवान भोलेनाथ को रुद्र रूप पंचमुख है।’’

उन्होंने कहा कि सभी ज्योतिर्पीठों के मंदिरों के शीर्ष पर ‘त्रिशूल’ है, परंतु बाबा बैद्यनाथ के मंदिर में ही पंचशूल स्थापित है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा कवच के कारण ही इस मंदिर पर आज तक किसी भी प्राकृतिक आपदा का असर नहीं हुआ है। कई धर्माचार्यों का मानना है कि पंचशूल मानव शरीर में मौजूद पांच विकार-काम, क्रोध, लोभ, मोह व ईष्र्या को नाश करने का प्रतीक है।

गौरतलब बात है कि पंचशूल को मंदिर से नीचे लाने और फिर ऊपर स्थापित करने का अधिकार स्थानीय एक ही परिवार को प्राप्त है। वर्ष भर शिवभक्तों की यहां भारी भीड़ लगी रहती है, परंतु सावन महीने में यह पूरा क्षेत्र केसरिया पहने शिवभक्तों से पट जाता है। भगवान भोलेनाथ के भक्त 105 किलोमीटर दूर बिहार के भागलपुर के सुल्तानगंज में बह रही उत्तर वाहिनी गंगा से जलभर कर पैदल यात्रा करते हुए यहां आते हैं और बाबा का जलाभिषेक करते हैं।