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Wednesday, 16 May 2018

May 16, 2018

Astrology News: यमराज पर भारी पड़ गई एक नारी, बनीं सौ पुत्रों की माता

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वट सावित्री व्रत ज्‍येष्‍ठ मास के कृष्‍ण पक्ष की अमावस्‍या को मनाया जाता है। यह व्रत पति की दीर्घायु और संतान प्राप्ति की कामना के लिए महत्‍वपूर्ण है। व्रत से जुड़ी सावित्री की कथा में बताया गया है कि यदि एक स्‍त्री धैर्य और बुद्धिमानी के साथ कठिन परिस्थिति का सामना करे तो यमराज को भी उसके आगे हार माननी पड़ जाती है। देखिए सावित्री की चतुरता ने न केवल उसके पति के प्राण वापस लौटाए बल्कि उन्‍हें 100 पुत्रों की मां भी बनाया…

पिता ने कहा पुत्री से ‘अपने अनुसार चुन लें वर’

यौवनावस्‍था को प्राप्‍त कर लेने के पश्‍चात सावित्री के पिता मद्र देश के राजा अश्‍वपति अपनी पुत्री से कहा कि तुम अत्‍यंत विदुषी हो और अपने पति की खोज तुम अपने अनुसार स्‍वयं ही कर लो

सावित्री ने चुना सत्‍यवान को

पिता की आज्ञा के साथ ही सावित्री एक बुद्धिमान मंत्री को साथ लेकर पति की खोज पर निकल पड़ीं। काफी खोजबीन के बाद उन्‍हें सत्‍यवान के रूप में एक योग्‍य वर मिला। सावित्री ने लौटकर अपने पिता को सत्‍यवान के बारे में बताया तो वहां मौजूद देवर्षि नारद कहने लगे कि सावित्री ने अपने पति का सही चुनाव नहीं किया। उन्‍होंने जिस सत्‍यवान को पति के रूप में चुना है, उसकी आयु अब मात्र एक वर्ष ही शेष है। 

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नारद जी के वचन सावित्री को न डिगा सके

नारद जी के वचन सुनकर भी सावित्री बोलीं- ‘भारतीय नारी जीवन में केवल एक बार ही अपना पति चुनती है। इसलिए मैं सत्‍यवान से ही विवाह करूंगी।’ विवाह के पश्‍चात सावित्री अपने राजसी ठाठ-बाठ छोड़कर अपने पति और सास-ससुर के साथ वन में जीवन व्‍यतीत करने लगीं। सत्‍यवान के पिता शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन का राजपाट उनके पड़ोसी राजा ने छीन लिया था। तब से वह अपने पुत्र के साथ वन में रह रहे थे।

सावित्री के मन में बढ़ता जा रहा था भय

सावित्री जैसे-जैसे अपने वैवाहिक जीवन में रम रही थीं, वैसे-वैसे उनका भय भी बढ़ता जा रहा था कि वह दिन करीब आने वाला है जब सत्‍यवान की मृत्‍यु हो जाएगी। उस दिन के आते ही सावित्री साया बनकर अपने पति के साथ रहने लगी। वन में लकड़ी काटने के लिए सत्‍यवान जैसे ही पेड़ पर चढ़े वह अस्‍वथ होकर जमीन पर गिर पड़े। सावित्री ने उन्‍हें संभाला और उनका सिर अपनी गोद में रखकर लिटा लिया। कुछ समय बाद सत्‍यवान अचेत हो गए। सावित्री सब कुछ समझ चुकी थीं। 

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यमराज और सावित्री का वार्तालाप

सावित्री अपने पति की मृत्‍यु का विलाप कर ही रही थीं कि थोड़ी देर में यमराज प्रकट हो गए। यमराज सत्‍यवान को अपने साथ लेकर दक्षिण दिशा की ओर जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल दीं। सावित्री को अपने पीछे आते देख यमराज ने उनसे कहा, ‘तू मेरे पीछे मत आ क्योंकि तेरे पति की आयु पूर्ण हो चुकी है और वह अब तुझे वापस नहीं मिल सकता। अब तू लौट कर अपने पति के मृत शरीर की अन्त्येष्टि कर।’ सावित्री ने उत्‍तर दिया, ‘मैं आपके तो क्‍या अपने पतिव्रता धर्म को निभाने के लिए किसी भी लोक तक जा सकती हूं।’

सावित्री से प्रसन्‍न होकर यमराज ने दिया यह वर

सावित्री के पतिव्रता धर्म से प्रसन्‍न होकर यमराज ने उनसे एक वर मांगने को कहा। सावित्री ने वर में अपने नेत्रविहीन ससुर के लिए नेत्र ज्‍योति मांगी। यमराज ने कहा, तथास्‍तु। फिर से सावित्री ने कहा, ‘मुझे आप जैसे महान देवता के दर्शन हुए, मैं धन्‍य हो गई।’ सावित्री की इन बातों से यमराज ने फिर से प्रसन्‍न होकर एक वर मांगने को कहा। इस बार सावित्री ने अपने ससुर को उनका राज्‍य वापस मिलने का वर मांग लिया। यह सिलसिला चलता रहा और सावित्री की बातों से यमराज प्रसन्‍न होते रहे और सावित्री एक के बाद एक वर मांगती गईं।

जब सावित्री ने मांगा संतान प्राप्ति का वर

जब यमराज ने सावित्री से अंतिम वर मांगने को कहा तो सावित्री बोलीं, मुझे अपने ससुर द्युमत्सेन के कुल की वृद्धि के लिए 100 पुत्र प्राप्‍त करने का वरदान दें। यमराज फिर से तथास्‍तु बोलकर चल दिए। सावित्री भी पीछे-पीछे चल दी। सावित्री को फिर से पीछे आता देख यमराज ने कहा, मेरा कहना मान और अब तू वापस चली जा। इस पर सावित्री बोलीं, आपने जो मुझे 100 पुत्र प्राप्‍त करने का वरदान दिया है। यदि मेरे पति का अंतिम संस्‍कार हो गया तो मैं 100 पुत्रों को कैसे जन्‍म दूंगी। सावित्री की इस चतुरता के आगे यमराज को हार माननी पड़ी। यमराज ने सत्‍यवान को जीवनदान दिया और इस प्रकार सावित्री ने आगे चलकर 100 पुत्रों को जन्‍म दिया।

स्रोत : navbharattimes

Friday, 18 August 2017

August 18, 2017

बाबा बैद्यनाथ धाम, यहां ‘पंचशूल’ के दर्शन मात्र से ही पूरी होती है हर मनोकामना

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भारत के प्रसिद्ध शैव तीर्थस्थलों में झारखंड के देवघर का बैद्यनाथ धाम (बाबाधाम) अत्यंत महत्वपूर्ण है। बैद्यनाथ धाम को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वाधिक महिमामंडित कहा जाता है। यही कारण है कि यहां के ज्योतिर्लिंग पर जलाभिषेक करने वालों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके शीर्ष पर त्रिशूल नहीं, ‘पंचशूल’ है, जिसे सुरक्षा कवच माना गया है।

धर्माचार्यों का इस पंचशूल को लेकर अलग-अलग मत है। मान्यता है कि पंचशूल के दर्शन मात्र से ही भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं। मंदिर के तीर्थ पुरोहित दुर्लभ मिश्रा बताते हैं, ‘‘धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि भगवान शंकर ने अपने प्रिय शिष्य शुक्राचार्य को पंचवक्त्रम निर्माण की विधि बताई थी, जिनसे फिर लंकापति रावण ने इस विद्या को सिखा था। पंचशूल की अजेय शक्ति प्रदान करता है।’’

कहा जाता है कि रावण ने लंका के चारों कोनों पर पंचशूल का निर्माण करवाया था, जिसे राम को तोडऩा आसान नहीं हो रहा था। बाद में विभिषण द्वारा इस रहस्य की जानकारी भगवान राम को दी गई और तब जाकर अगस्त मुनि ने पंचशूल ध्वस्त करने का विधान बताया था। रावण ने उसी पंचशूल को इस मंदिर पर लगाया था, जिससे इस मंदिर को कोई क्षति नही पहुंचा सके।

मिश्र कहते हैं, ‘‘त्रिशूल’ को भगवान का हथियार कहा जाता है, परंतु यहां पंचशूल है, जिसे सुरक्षा कवच के रूप में मान्यता है। भगवान भोलेनाथ को प्रिय मंत्र ‘ओम नम: शिवाय’ पंचाक्षर होता है। भगवान भोलेनाथ को रुद्र रूप पंचमुख है।’’

उन्होंने कहा कि सभी ज्योतिर्पीठों के मंदिरों के शीर्ष पर ‘त्रिशूल’ है, परंतु बाबा बैद्यनाथ के मंदिर में ही पंचशूल स्थापित है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा कवच के कारण ही इस मंदिर पर आज तक किसी भी प्राकृतिक आपदा का असर नहीं हुआ है। कई धर्माचार्यों का मानना है कि पंचशूल मानव शरीर में मौजूद पांच विकार-काम, क्रोध, लोभ, मोह व ईष्र्या को नाश करने का प्रतीक है।

गौरतलब बात है कि पंचशूल को मंदिर से नीचे लाने और फिर ऊपर स्थापित करने का अधिकार स्थानीय एक ही परिवार को प्राप्त है। वर्ष भर शिवभक्तों की यहां भारी भीड़ लगी रहती है, परंतु सावन महीने में यह पूरा क्षेत्र केसरिया पहने शिवभक्तों से पट जाता है। भगवान भोलेनाथ के भक्त 105 किलोमीटर दूर बिहार के भागलपुर के सुल्तानगंज में बह रही उत्तर वाहिनी गंगा से जलभर कर पैदल यात्रा करते हुए यहां आते हैं और बाबा का जलाभिषेक करते हैं।