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Tuesday, 27 February 2018

डॉ राजेन्द्र प्रसाद का जीवन परिचय...

Dr rajendra Prasad Biography in hindi

Dr Rajendra Prasad Biography in hindi – राजेन्द्र प्रसाद भारतीय गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति थे । उनमें सादगी, त्याग, सेवा और देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। राजेन्द्र प्रसाद ने अपना पूरा जीवन पूरी तरीके से स्वतंत्रता आन्दोलन को समर्पित कर दिया था। वह बहुत ही सरल स्वभाव के इंसान थे जो सभी वर्ग को व्यक्तियों के साथ बहुत ही सामान्य व्यवहार रखते थे।
डॉ राजेन्द्र प्रसाद का प्रारम्भिक जीवन- Early Life of Dr Rajendra Prasad

डॉ प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर, 1884 को बिहार के एक छोटे से गांव जीरादेई में हुआ था। उनके पूर्वज संयुक्त प्रांत के अमोढ़ा नाम की जगह से पहले बलिया और फिर बाद में सारन (बिहार) के जीरादेई आकर बसे थे। आपके पिता महादेव सहाय की तीन बेटियां और दो बेटे थे, जिनमें राजेन्द्र प्रसाद सबसे छोटे थे। उनके पिता फ़ारसी और संस्कृत भाषा के विद्वान थे. जबकि उनकी मॉं कमलेश्वरी देवी एक धार्मिक महिला थी। राजेन्द्र प्रसाद को केवल 5 वर्ष की उम्र में ही उनके समाज के रिति-रिवाजों के अनुसार उन्हे एक मौलवी के सुपुर्द कर दिया गया था जिसने उन्हे फारसी भाषा सिखाई।

डॉ राजन्द्र प्रसाद की शिक्षा- Rajendra Prasad Education

राजन्द्र प्रसाद की प्रारंभिक शिक्षा उन्हीं के गांव जीरादेई में हुई। बचपन से ही उनकी दिलचस्पी पढ़ाई में थी। 1896 में वें जब वह पांचवी कक्षा में थे तब 12 वर्ष की उम्र में उनकी शादी राजवंशी देवी से हो गयी थी। आगे की पढाई के लिए उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में आवेदन पत्र डाला जंहा उनका दाखिला हो गया और 30 रूपए महीने की छात्रवृत्ति मिलने लगी। उनके गांव से पहली बार किसी युवक ने कलकत्ता विश्विद्यालय में प्रवेश पाने में सफलता प्राप्त की थी। तो स्वाभाविक है कि राजेंद्र प्रसाद और उनके परिवार के लिए यह गर्व की बात थी।

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इसके बाद राजेन्द्र प्रसाद ने सन् 1902 में कलकत्ता प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया। 1915 में कानून में मास्टर की डिग्री पूरी की जिसके लिए उन्हें गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया। इसके बाद उन्होंने कानून में डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त की। इसके बाद पटना आकर वकालत करने लगे जिससे उन्हे दौलत और शौहरत दोनों भरपूर मात्रा में प्राप्त हुई।

डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद के राजनीति में कदम-

बिहार मे अंग्रेज सरकार के नील के खेत थे, सरकार अपने मजदूर को उचित वेतन नहीं देती थी। 1917 मे गांधीजी ने बिहार आकर इस समस्या को दूर करने की पहल की। उसी दौरान डॉ प्रसाद गांधीजी से मिले और उनकी विचारधारा प्रभावित हुए। 1919 मे पूरे भारत मे सविनय आन्दोलन की लहर थी। गांधीजी ने सभी स्कूल, सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार करने की अपील की। जिसके बाद डॉ प्रसाद ने अंपनी नौकरी छोड़ दी।

चम्पारण आंदोलन के दौरान राजेन्द्र प्रसाद गांधी जी के वफादार साथी बन गए थे। गांधी जी के प्रभाव में आने के बाद उन्होंने अपने पुराने और रूढिवादी विचारधारा का त्याग कर दिया और एक नई ऊर्जा के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। 1931 में काँग्रेस ने आन्दोलन छेड़ दिया। इस दौरान डॉ प्रसाद को कई बार जेल जाना पड़ा। 1934 में उनको बम्बई काँग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। वे एक से अधिक बार अध्यक्ष बनाये गए। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। इस दौरान वे गिरिफ्तार हुए और नजर बंद कर दिए गए|

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भले ही 15 अगस्त, 1947 को भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई लेकिन संविधान सभा का गठन उससे कुछ समय पहले ही कर लिया गया था जिसके अध्यक्ष डॉ प्रसाद चुने गए थे। संविधान पर हस्ताक्षर करके डॉ प्रसाद ने ही इसे मान्यता दी।

राजेन्द्र प्रसाद बतौर राष्ट्रपति-First President of India

डॉ राजेन्द्र प्रसाद के रूप में भारत गणराज्य को 26 जनवरी 1950 में प्रथम राष्ट्रपति मिला। इसके बाद वह 1962 तक वह राष्ट्रपति रहे। इसके बाद वह स्वेच्छा से 1962 मे अपने पद को त्याग कर वे पटना चले गए ओर जन सेवा कर जीवन व्यतीत करने लगे।

भारत के राष्ट्रपति बनने से पहले वे एक मेधावी छात्र, जाने-माने वकील, आंदोलनकारी, संपादक, राष्ट्रिय नेता, तीन बार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष, भारत के खाद्य एवं कृषि मंत्री, और संविधान सभा के अध्यक्ष रह चुके थे।

डॉ राजनेद्र प्रसाद को उनके राजनैतिक और सामाजिक योगदान के लिए उन्हें भारत के सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान “भारत रत्न” से 1962 नवाजा गया।

डॉ राजेन्द्र प्रसाद का निधन-

28 फरवरी, 1963 को डॉ प्रसाद का निधन हो गया। उनके जीवन से जुड़ी कई ऐसी घटनाएं है जो यह प्रमाणित करती हैं कि राजेन्द्र प्रसाद बेहद दयालु और निर्मल स्वभाव के व्यक्ति थे। भारतीय राजनैतिक इतिहास में उनकी छवि एक महान और विनम्र राष्ट्रपति की है।

1921 से 1946 के दौरान राजनितिक सक्रियता के दिनों में राजेन्द्र प्रसाद पटना स्थित बिहार विद्यापीठ भवन में रहे थे। मरणोपरांत उसे ‘राजेन्द्र प्रसाद संग्रहालय’ बना दिया गया।

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